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इल्म की कदर वा कीमत हिंदी स्टोरीज

इल्म की कदर वा कीमत हिंदी स्टोरीज hindi Stories
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 इल्म की कदर वा कीमत हिंदी स्टोरीज

इल्म की कदर वा कीमत हिंदी स्टोरीज


शैख़ सादी एक मर्तबा शाम या इराक के किसी शहर से गुजर रहे थे कि आपने देखा कि काजी शहर अपनी मजलिश लगाए बैठा है शैख़ सादी भी उस मजलिस मे बैठ गये आपके कपडे उस वक़्त फ़टे पुराने थे और आपकी हालत दगरगु थी मजलिस मे बैठे हुऐ लोग और सरफा ने शैख़ सादी को कम हैसियत जानते हुऐ उनको महफ़िल से निकाल दिया आप उठकर पाए मजलिस मे जा बैठे आपने सुना कि अहले मजलिस किसी नुक्त पर बहस कर रहे हैँ मगर कोई हल तलाश करने मे नाकाम हैँ आपने दूर से सदा लगाई और कहा कि काजी शहर अगर पसंद फरमाये तो आपका ये हल तलब मसला मैं हल कर सकता हू काजी ने आपको इजाजत देदी आपने निहायत सहल और काबिले फहम तरीके से ये मसला हल कर दिया हर तरफ से आपको दादे तहसीन मिलने लगी आफरीन वा शाबाश की आवाजे आने लगी जब काजी शहर ने आपको बुलंद मर्तबे पर जाता हुआ देखा तो वोह अपना इमामा उतारकर सादी को देने लगे मगर शैख़ सादी ने इंकार कर दिया और फरमाया कि अगर मैंने इमामा पहन लिया तो फिर मेरी आँखों पर भी चर्बी चढ़ जायेगी और गरीब लोग मुझे हकीर वा जलील मालूम होंगे और यूँ मुझे लोगों से मुख्तलिफ लानत वा मलामत के अल्फाज सुनने पड़ेंगे,



कुरबे इलाही अल्लाह की दोस्ती मे है


शैख़ सादी फरमाते हैँ कि एक मर्तबा मैं बाबैक की एक जामा मस्जिद मे तकरीर कर रहा था अहले मजलिस बड़े मुर्दा दिल थे किसी पर मेरी तकरीर का कोई असर नहीं हो रहा था मैंने अपने मौजू बयान अल्लाह ताला के उस फरमान के मुतालिक शुरू किया हुआ था हम इन्सान की शरग से भी ज़ियादा नजदीक हैँ मैं अपनी तरंग मे तकरीर किये जा रहा था मगर मुझे सामईन की बे हसी पर अफसोस जरूर था फिर मैंने एक शायर पढ़ा जिसका मतलब ये था मेरा दोस्त मेरे ज़ियादा करीब है जबकि मैं उससे दूर हू और किस कदर बदनसीब हूँ मैं कि दोस्त पहलू मे है और मैं उससे जुदा हूँ उसी असना मे वहाँ से एक मर्द कलंदर गुजरा जब उसने ये शायर सुना तो वोह बे इख़्तियार नारे लगाने लग गया उसकी बे खुदी और नारे बाजी को देख कर हाजरीन मजलिस भी कैफियत वा मस्ती मे आकर नारे लगाने लगे उस वक़्त मेरी जुबान से बे इख़्तियार ये अल्फाज निकले आये पाक खुदा वन्द करीम अहले दिल अगर चे दूर रहते हुऐ भी दिल के करीब रहते हैँ मगर अकल के अंधे दिल के नजदीक रहते हुऐ भी दूर रहते हैँ यही वजा है कि लोग खुदा को तलाश करते हैँ कभी जंगलो मे कभी पहाड़ो मे मगर उनको ये मालूम नहीं होता कि अल्लाह ताला तो दिल के अंदर है उसे जब भी देखना हो जरासी गर्दन ख़म करने की जरुरत होती है वोह हर वक़्त देखा जा सकता है,,,

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