अल्लाह ताला का कुर्ब और उसकी निशान्या सुफी मुस्लिम Sufi Muslim
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हजरत जुलनून मिश्री रहमातुल्लाहअलै फरमाते हैं कि मैं कोहे लेबनान के एक गार में एक बुजुर्ग को देखा कि उनका सर और दाढ़ी के बाल बिल्कुल सफेद और सर के बाल गुब्बार आलूद हैँ और वोह निहायत लागर हैं और नमाज में मशगूल हैं जब उन्होंने सलाम फेरा तो मैंने सलाम किया उन्होंने सलाम का जवाब देकर फिर नियत बांध ली उसी तरह असर तक बराबर नमाज में मशगूल रहे फिर एक पत्थर के सहारे बैठ गए और सुभान अल्लाह सुभान अल्लाह पढ़ने लगे और मुझसे कुछ बातचीत ना की मैंने खुद ही अर्ज किया कि हज़रत मेरे लिये अल्लाह से दुआ फरमाइये फरमाया अल्लाह ताला तुझको अपने कुर्ब से मानूष फर्मा दे,
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मैंने कहा कि कुछ और फरमाइये फरमाया कि बेटा अल्लाह ताला जिसे अपने कुर्ब से मानूष कर देता है उसे चार खसलते अता फरमाता है. इज्जत बगैर खानदान. इल्म बे तलब. गिना बगैर माल. उन्स बे जमात. यह कहकर जोर से एक चीख मारी और बेहोश हो गये और पूरे तीन दिन बाद इफाका पाया उठकर वजु किया और मुझसे पूछ कर सब फौतसुदा नमाजों की कजा की और मुझसे सलाम करके रुखसत होने लगे मैंने अर्ज किया कि हज़रत मैं तो 3 दिन इसी उम्मीद से पड़ा रहा कि शैख कुछ और नसीहत फरमाएंगे और मुझे उस वक्त रोना आ गया फरमाया अपने मौला को दोस्त रख और उसके बदले किसी और की चाहत ना कर क्योंकि अल्लाह को दोस्त रखने वाले ही तमाम बन्दों के सरताज और अल्लाह के बरगुजिदा और उसके खालिस बंदे हैं फिर एक चीख मारी और जान बाहक हो गए कुछ देर बाद आब्दों की एक जमात पहाड़ से उतरी और तजहेज वा तकफीन करने में मशगूल हो गई दफन से फ़ारिग होने के बाद मैंने उनसे पूछा साहिबों इस शेख का क्या नाम था कहां शेबान मसाब रहमातुल्लाह