हजरत बशर हाफी और सूफी फुकरा sufi stories in hindi
हजरत बशर हाफी फरमाते हैँ कि उनके पास एक गिरोह आया और सलाम किया, उन्होंने पूछा तुम कौन हो, कहा हम शाम के रहने वाले हैँ आपको सलाम करने अये हैँ और हज का इरादा है आपने फरमाया खुदा तुम्हारा हज कबूल फरमाये उन्होंने कहा आप भी हमारे हमराह तसरीफ ले चलें ताकि आपकी सोहबत मे हम सब हज अदा करें, उन्होंने इंकार किया, उन्होंने इसरार किया, फिर फरमाया जब तुम्हारी यहि ख़ुशी है तो मैं तीन शर्तो पर मंजूर करता हूँ अपने साथ कोई चीज अज किसिम तोसा सफर ना ले चलें ना हम किसी से राह मे सवाल करें अगर हमको कोई कुछ दे तो वोह भी ना लें उन्होंने कहा ना साथ कुछ ले जायें ना सवाल करें ये तो हो सकता है लेकिन अगर कोई दे और बावजूद जरुरत के ना लें इसकी कुदरत हमको नहीं बशर हाफी ने फरमाया शायद तुम घरसे अपने तोसों पर भरोसा करके चले हो खुदा ताला पर तवक्कल नहीं है तुम सब चले जाओ और मुझको मेरे हाल पर छोड़ दो फिर फरमाया फकीरों मे अच्छे तीन फकीर हैँ एक वोह है जो सवाल नहीं करता और अगर दिया जाये लेता भी नहीं ये फकीर रूहानियों मे से है पाकबाज रूहानियों के साथ है दूसरा फकीर सवाल नहीं करता अगर कोई दे तो ले लेता है ऐसे फकीर के वास्ते हजरत कदस मे दस्तर खुवान बिछाये जायेंगे तीसरा फकीर सवाल करता है और अगर दें बकद्र किफायत ले लेता है इसका कुफ़्फ़ारा इसका सदक है यानि हाजत के सवाल करता है और हाजत से जियादा नहीं लेता,
रीवायेत है कि हजरत बशर हाफी के पास एक जमात सुफियों की आई सब गदड़ी पोश थे आपने कहा अये लोगों अल्लाह से डरो और ये लिबास तर्क करो कियोंकि इस लिबास से तुम पहचाने जाते हो सब खामोश रहे मगर एक जवान उन मेसे बोला कसम खुदा की हम इसको जरूर पहनेंगे जरूर पहनेंगे यहाँ तक की तमाम दीन खुदा के वास्ते हो जाये आपने कहा खूब कहा अये जवान तुम्हारे ही जैसे इसके पहनने की सालाहियत रखते हैँ
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