अल्लाह के वली का नमाज़ छोड़ना जियारत रसूल हजरत जुलनून मिश्री Allah Ke Wali Ki Namaz hazrat Julnoon Misri
हज़रत जुलनून मिश्री के एक अकीदतमंद ने जिसने चालीस चिल्ले खींचे चालीस हज किये और चालीस बरस तक जागता रहा गर्ज ये कि इतनी इबादत वा रियाजत के बावजूद आजतक अल्लाह ताला मुझसे हमकलाम नहीं हुआ और ना कभी रमूजे खुदावंदी मुझपर मुनकशिफ हो सके लेकिन नवूजबिल्लाह ये अल्लाह ताला से सिकवा नहीं बल्कि अपनी बद नसीबी का इज़हार है,
islamic story in hindi
आपने इस इरादत मंद से फरमाया कि खूब पेट भरकर खाना खाओ और ईशा की नमाज पढ़े बगैर आराम से सो जाओ मुरीद ने आपके हुकुम की तामील की पेट भरकर खाना तो खा लिया मगर दिल ने नमाज को तर्क करना गवारा ना किया इसलिये नमाज पढ़ने के बाद सो गये और खुवाब मे हुजूरे अकरम(सा, म ) की जियारत हुई,
Auliya
आपने फरमाया अल्लाह ताला की बारगाह से ना उम्मीद लौटने वाला ना मुराद होता है तुम यकीन करो कि अल्लाह ताला तेरी चालिस साला रियाजत का सिला जरूर देगा लेकिन जुलनून को हमारा पैगाम पंहुचा देना कि तुम्हे शहर भर मे इसलिये जलील करेंगे कि तू फिर कभी हमारे दोस्तों को फरेब मे मुब्तला ना कर सके,
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उस मुरीद ने हज़रत जुलनून मिश्री को अपना सुनाया तो उनकी आँखों मे मसरत के आंसू झलक पड़े लेकिन अगर कोई मुआत्तार्ज ये कहे कि किया कोई मुर्शिद किसी को नमाज ना पढ़ने का हुकुम दे सकता है तो उसका जवाब ये है कि मुर्शिद की हैसियत तबीब के बराबर होती है और कभी कभार तबीब को जहर से भी मरीज का इलाज करना पड़ता है और चुंकि आपको बाखूबी मालूम था कि मेरे कहने से मुरीद हरगिज नमाज तर्क नहीं कर सकता इसलिये आपने ऐसा हुकुम दिया और इसके इलावा तरीकत की राहों मे ऐसे अहवाल भी आजाते हैँ जो बजाहिर शरीयत के मुनाफी होते हैँ लेकिन वोह दरहकीकत अपनी जघा बिलकुल दुरुस्त होते हैँ जिस तरह हज़रत खिज्र को लड़के के कतल का हुकुम दिया गया लेकिन मनसाये खुदावंदी यही था गोया ये बात अपनी जघा मुसललिम है कि खिलाफे सर कोई काम ना किया जाये लेकिन रहे तरीकत मे ऐसे अहवाल उमूमन पेश आते है जिससे किसी तोर भी इंकार मुमकिन नहीं
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